बड़ी घोषणा हुई, लेकिन शेयर फिसल गया—रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) में शुक्रवार, 29 अगस्त 2025 को 2.3% की गिरावट रही और बीएसई पर भाव ₹1,355.45 पर बंद हुआ। इंट्रा-डे में स्टॉक ₹1,350.30 तक गया, जो 28 अप्रैल 2025 के बाद सबसे निचला स्तर है। यह वह दिन था जब कंपनी की 48वीं एजीएम के बाद बाजार एक तेज रैली की उम्मीद कर रहा था, पर नतीजा उलटा निकला।
चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी ने एजीएम में कई घोषणाएं कीं। सबसे बड़ी हेडलाइन थी Jio IPO का टाइमलाइन—उन्होंने साफ किया कि जियो को 2026 की पहली छमाही में स्टॉक एक्सचेंजों पर लिस्ट कराया जाएगा, बशर्ते नियामकीय मंजूरियां मिलें। बाजार का एक हिस्सा 2025 की मौजूदा वित्तीय साल में आईपीओ का संकेत चाहता था। जब वह नहीं मिला, तो भावनाएं ठंडी पड़ीं और शेयर में बिकवाली हावी हो गई।
वेल्थमिल्स सिक्योरिटीज के इक्विटी स्ट्रैटेजिस्ट क्रांति बाठीनी का आकलन है कि जियो और रिटेल के आईपीओ लंबे समय से लंबित हैं, इसलिए देरी निवेशकों को चुभ रही है। जिन लोगों ने नजदीकी समय में वैल्यू अनलॉकिंग की उम्मीद पर पोजीशन बनाई थी, वे निराश दिखे।
दिन भर के कारोबार में जो बातें साफ दिखीं, वे ये रहीं:
अब सवाल यह है कि इतना नेगेटिव रिएक्शन क्यों? वजहें दो हैं—टाइमलाइन और स्ट्रक्चर। टाइमलाइन इसलिए कि जल्द नकदीकरण की उम्मीदें आगे खिसक गईं। स्ट्रक्चर इसलिए कि मौजूदा RIL शेयरहोल्डर्स को जियो के आईपीओ से सीधे कोई अलॉटमेंट या डिमर्जर जैसा तत्काल लाभ नहीं दिख रहा।
एजीएम में एक और अहम घोषणा हुई—कंपनी ने ‘Reliance Intelligence’ नाम से एक नई, पूरी तरह स्वामित्व वाली सहायक कंपनी बनाने का ऐलान किया, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमताओं को भारत में स्केल करेगी। इसके साथ, गूगल के साथ साझेदारी के जरिए ऊर्जा, रिटेल, टेलीकॉम और फाइनेंशियल सर्विसेज में एआई-ड्रिवन ट्रांसफॉर्मेशन की योजना है। टेक-ड्रिवन एफिशिएंसी और नए रेवेन्यू स्ट्रीम्स की यह कहानी लॉन्ग टर्म में पॉजिटिव हो सकती है, पर तत्काल बाजार की नजर आईपीओ टाइमिंग पर अटकी रही।
होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट भी चर्चा में रहा। जब पेरेंट कंपनी अपने किसी बड़े एसेट को सब्सिडियरी के रूप में होल्ड करती है, तो बाजार अक्सर पेरेंट के वैल्यूएशन पर 20-30% का डिस्काउंट लगा देता है। तर्क ये कि कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर, टैक्स, कैश-अपस्ट्रीमिंग और गवर्नेंस लेयरिंग के कारण पेरेंट के शेयरहोल्डर को सब्सिडियरी का पूरा “लुक-थ्रू” वैल्यू नहीं मिलता।
रिलायंस पर यह गणित कैसे बैठता है, इसका एक अंदाजा विश्लेषकों के दिए नंबरों से बनता है:
इसका मतलब यह नहीं कि स्टॉक टूटना तय है। मतलब सिर्फ इतना है कि बाजार निकट भविष्य में “वैल्यू अनलॉक” के साथ-साथ “डिस्काउंट” को भी प्राइस-इन कर रहा है। अगर आईपीओ तक बिजनेस परफॉर्मेंस मजबूत रहा, फ्री कैश फ्लो बेहतर बने और कैपेक्स डिसिप्लिन दिखे, तो यही मैट्रिक्स सपोर्ट भी दे सकते हैं।
अब स्ट्रक्चर पर। दो रास्ते होते—डिमर्जर और डायरेक्ट आईपीओ। डिमर्जर में मौजूदा पेरेंट कंपनी के शेयरहोल्डर्स को नई कंपनी के शेयर मिलते हैं, इसलिए तात्कालिक वैल्यू रिलीज दिखती है। डायरेक्ट आईपीओ में नई पूंजी आती है, बिजनेस की अपनी बैलेंस शीट मजबूत होती है, लेकिन पेरेंट के शेयरहोल्डर को सीधे शेयर नहीं मिलते। जियो के मामले में दूसरा रास्ता चुना गया दिखता है, इसलिए “मेरे लिए क्या” वाला सवाल बाजार में उठा।
टाइमलाइन क्यों खिसकी? बड़े आईपीओ में कई कदम होते हैं—DRHP फाइलिंग, SEBI की मंजूरी, स्टॉक एक्सचेंजों की नोड, प्री-आईपीओ प्लेसमेंट, वैल्यूएशन बेंचमार्किंग, और मार्केट विंडो का चुनाव। टेलीकॉम जैसे कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर में 5G/6G, फाइबर, एंटरप्राइज क्लाउड जैसे क्षेत्रों में चल रहे निवेश भी फंडिंग प्लानिंग से जुड़े होते हैं। इसलिए 2026 H1 का संकेत एक प्रैक्टिकल टाइमटेबल लगता है, भले ही शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स को यह लंबा लगे।
रिलायंस की एआई प्लानिंग पर लौटें। ‘Reliance Intelligence’ का मकसद ऑपरेशंस में एआई-फर्स्ट अप्रोच लाना है—सप्लाई चेन, प्राइसिंग, कस्टमर टार्गेटिंग, नेटवर्क प्लैनिंग, फ्यूल-टू-केमिकल्स ऑप्टिमाइजेशन तक। गूगल के साथ काम करने का मतलब है क्लाउड, एआई मॉडल्स और स्केल पर डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल। यह कहानी तुरंत पी/ई नहीं बदलती, लेकिन मार्जिन और रेवेन्यू प्रोडक्टिविटी पर आने वाले सालों में असर डाल सकती है।
दिन के अंत में निवेशकों ने क्या प्राइस-इन किया? एक, नजदीकी समय में जियो का कैश-आउट नहीं; दो, लिस्टिंग के बाद होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट की संभावना; तीन, टेक अपसाइड लॉन्ग टर्म में। इसी मिलेजुले सेट-अप में स्टॉक 52-वीक हाई से 13% नीचे है, फिर भी YTD 14% ऊपर—मतलब लॉन्ग-होराइजन वाले अभी भी बैठे हैं, शॉर्ट-होराइजन वाले निकल रहे हैं।
आगे बाजार किन ट्रिगर्स को देखेगा?
रिस्क फैक्टर्स भी साफ हैं—नियामकीय देरी, ग्लोबल रिस्क-ऑफ मोड, कमोडिटी प्राइस वोलैटिलिटी, और टेलीकॉम में प्रतिस्पर्धा। अगर ये सॉफ्ट रहते हैं, तो प्राइसिंग पावर और कैश फ्लो सपोर्ट मिल सकता है; अगर ये सख्त हुए, तो वैल्यूएशन मल्टीपल्स दब सकते हैं।
शेयरहोल्डर कम्युनिकेशन के लिहाज से एजीएम ने मैसेज दिया—कंपनी तेज विकास की ओर है, पर वैल्यू अनलॉकिंग की घड़ी कंपनी अपने हिसाब से चुनेगी। ट्रेडर की टाइमिंग और कॉरपोरेट की टाइमिंग में अक्सर फर्क होता है। शुक्रवार की गिरावट में यही टकराव दिखा।
निवेशक क्या करें? यह स्टोरी सेगमेंट-सम ऑफ द पार्ट्स (SOTP) पर टिकी है—जियो, रिटेल, O2C, E&P, फाइनेंशियल सर्विसेज, और अब एआई। जिनको शॉर्ट-टर्म में कैटलिस्ट चाहिए, वे टाइमलाइन पर नजर रखें; जिनका होराइजन लंबा है, वे ऑपरेशनल मैट्रिक्स—सब्सक्राइबर ग्रोथ, ARPU, स्टोर प्रोडक्टिविटी, रिफायनिंग मार्जिन और लेवरेज—पर फोकस करें। जियो की लिस्टिंग, जब भी होगी, रिलायंस की कहानी को और पारदर्शी करेगी; वहीं डिस्काउंट का गणित भी साथ चलेगा।
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